कविता
| तारीख | लेखक | प्रतिसाद | |
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| हळूहळू साऱ्यांनीच प्रेमाचं दुकान मांडून टाकलं | खिलजि | 0 | |
| हळूहळू साऱ्यांनीच प्रेमाचं दुकान मांडून टाकलं | खिलजि | 4 | |
| सगळीकडे सारखेच | चांदणे संदीप | 0 | |
| सगळीकडे सारखेच | चांदणे संदीप | 17 | |
| परत पेटेल मेणबत्ती | खिलजि | 0 | |
| परत पेटेल मेणबत्ती | खिलजि | 0 | |
| संताप | कुसुमिता१ | 0 | |
| संताप | कुसुमिता१ | 2 | |
| रानभेदी..!! | विशुमित | 0 | |
| रानभेदी..!! | विशुमित | 6 | |
| रातराणीचे सुगंधी फूल आहे ती! | सत्यजित... | 0 | |
| रातराणीचे सुगंधी फूल आहे ती! | सत्यजित... | 13 | |
| उकाड्याची रात्र, भिजलेली दुपार | हणमंतअण्णा शंकराप्पा रावळगुंडवाडीकर | 6 | |
| उकाड्याची रात्र, भिजलेली दुपार | हणमंतअण्णा शंकराप्पा रावळगुंडवाडीकर | 0 | |
| असेहि एकदा व्हावे | खिलजि | 0 | |
| असेहि एकदा व्हावे | खिलजि | 14 | |
| दंतकथा | अनन्त्_यात्री | 5 | |
| दंतकथा | अनन्त्_यात्री | 0 | |
| ती जशी जशी जुनी होत गेली | खिलजि | 0 | |
| ती जशी जशी जुनी होत गेली | खिलजि | 0 |