मन! - २
मन दु:खाचा तरंग.. मन सुख, अंतरंग..
जसा फणसाचा गर.. कठीणात मऊसर!
मन अप्राप्य सागर.. अंतहीन कुतूहल..
जसा सुगंध अल्लड..शब्द-रूपाच्या पल्याड!
मन अस्तित्व प्रचिती..मन फक्त विसंगती!
जशी रात, न्हायलेली, चांदण-प्रकाशाच्या ज्योती!!
मन शब्दांची आरास..कल्पनांचा सहवास!
जशी सावली सजग..अव्यक्ताचं व्यक्त जग!!
--
मनी मनाचा विचार.. स्वत्व शोध.. निरंकुश!
मन आनंद केवळ.. डुंबण्याचा अवकाश!!
💬 प्रतिसाद
च
चांदणे संदीप
Fri, 08/17/2018 - 08:31
नवीन
अदभूत!!
Sandy
- Log in or register to post comments
व
विवेकपटाईत
Sat, 08/25/2018 - 05:14
नवीन
कविता आवडली.
- Log in or register to post comments
य
यशोधरा
Sat, 08/25/2018 - 09:14
नवीन
सुरेख!
- Log in or register to post comments